Friday, May 25, 2018

शह्रों शह्रों हर इक मंजर थोड़ा थोड़ा देख लिया।

ताजा ग़ज़ल 

शह्रों  शह्रों  हर   इक  मंजर   थोड़ा  थोड़ा  देख  लिया।
वीरानों  के  भीतर  जा  कर  कोना  कोना   देख  लिया।

ख्वाब में  इक दिन गांव  गया था और वहां पर जाते ही।
बादल  धरती  पानी   पर्वत  जंगल  दरिया  देख   लिया।

करवट  बदले  उठकर  बैठा  फिर  थोड़ा  सा टहला भी।
तन्हाई  का  नींद   से  आखिर   मैंने   रिस्ता  देख  लिया।

सबसे  मिलना  जुलना  हस कर लेकिन खुद से रहना दूर।
ये  होता है जिस  दिन  हमने  उनका  चेहरा   देख  लिया।

लब  पर  चुप्पी  आंख  में आंसू और बिछड़ने वाला दिन।
इक  लम्हे  में  सौ-सौ  दिन  को  देखो  जीना  देख लिया।

तन्हा  कमरा सूना चौखट और घड़ी का टिक टिक टिक
 

सन्नाटों    को   आवाजों   से   बातें   करना   देख   लिया।

इक  बस्ती  के  भीतर  जलता जब  से  देखा  है  इक घर।
मत  पूछो तब  अपने भीतर  क्या क्या जलता देख लिया।

उनसे मिलता प्यार भी करता और मैं खुद को जाता भूल।
लेकिन   उससे   पहले   मैने   अपना   रस्ता  देख  लिया।

राजीव कुमार



Sunday, May 20, 2018

दिन रात गजल शेर रुबाई का फैसला

अनमोल साहब की जमीन पर 😍

दिन रात गजल शेर रुबाई का फैसला
हम कर रहे हैं दिल की दवाई का फैसला

वो सब हसीन ख्वाब जो आंखो में कैद थे
अब कर लिया है उनकी रिहाई का फैसला

फैशन में बेलिबास शह्र देख कर हमें।
लेना पड़ा अदब से विदाई का फैसला।

बस्ती में जो मकान जले बन ही  जायेंगे ।
लेकिन हो खत्म पहले लड़ाई का फैसला

ई मेल फोन काल अजी कुछ तो कीजिये।
या कर लिया है हमसे जुदाई का फैसला

जिसका भला हुआ है वो ये फैसला करे ।
किसने किया था किसकी भलाई का फैसला ।

पढ़ लिख के भी लहू ही बहाना है तो हमें ।
मंजूर नहीं ऐसी पढ़ाई का फैसला।

राजीव कुमार

Friday, May 18, 2018

गजल गोई में तब तक फायदा है

गजल गोई में तब तक फायदा है
के जब तक मेहनताना मिल रहा है

कोई महफिल की जीनत हो गयी अब।
कोई महफिल का मालिक हो गया है

भला हो फेसबुक औ वाट्सअप का।
यहां  गूंगा भी शाइर बन चुका  है ।

किसी के शान में गुस्ताखियां हैं ।
किसी का नाम ही कुछ अटपटा है।

वफा के हक में दो एक शेर पढ़ के।
गली का रोमियो भी दिलजला है।

राजीव कुमार

खाने पीने का इन्तजाम करो
जिन्दा रहने का इन्तजाम करो

मुझको सच की तलाश करनी है
कोई चखने का इन्तजाम करो।

किसको तन्हाई से महब्बत है।
इससे बचने का इन्तजाम करो ।

आधिंयां चल रही है किस जानिब।
इनके थमने का इन्तजाम करो।

चांद हासिल किसे हुआ अब तक।
जाओ सोने का इन्तजाम करो।

आप ईमानदार बन जाना ।
पहले खाने का इन्तजाम करो।

राजीव कुमार

इक झूठ को सच बतलाता है ये देख के शक गहराता है।

कोशिस समिक्षार्थ 🙏

इक झूठ को सच बतलाता है ये देख के शक गहराता है।
जब अम्नों सूकूं का इक परचम वो शक्स कहीं लहराता है।

हर बार तेरी मन की बातें बस तू ही करता जाता है।
सच पूछने वालों की आखिर किस बात से तू घबराता है।

शोहरत के दिनों में आते ही गर्दिश के दिनों को भूल गया
ये दिन भी गुजरने वाले हैं किस चीज पे तू इतराता है।

हर शक्स परेशां दिखता है हर ओर है वहशत का आलम
ऐसे में तेरी तकरीरों पर क्या तू भी कभी शर्माता है।

ये गलिंयां सड़कें चौराहे सब हाल बताने लगते हैं ।
मालूम नहीं जाने कैसा तेरा शह्र से रिस्ता-नाता है ।

ये रश्मे सियासत है तो फिर हमें सिकवा किसी से कोई नहीं।
हम जानते हैं इस पेशे में हर कोई धोखा खाता है।

राजीव कुमार

🙏🙏🙏

पग- पग में ठोकरों की डगर है कि नहीं है

ग़ज़ल
कुछ सुधार के साथ

पग- पग में  ठोकरों  की  डगर  है कि नहीं है
दुश्वार  जिन्दगी  का  सफर  है  कि  नहीं है

बस्ती को एक दिन न बियाबान बना दे
शाहों के फ़ैसले पे नज़र है कि नहीं है

हर बार रैलियों में सड़क पर हो तुमी क्यो
दावों की असलियत पे नजर है कि नहीं है।

कल शाम रोशनी को निगल बैठा अँधेरा
सूरज तुझे ज़रा भी ख़बर है कि नहीं है
 
तामीर ज़ेहन में जो कोई शह्र किये था
उस शख़्स का भी शह्र में घर है कि नहीं है

सदियों सी लम्बी रक्खी है जो एक कहानी
बतलाओ मुख़्तसर सा सफ़र है कि नहीं है

सूरज की आग अपने बदन पर लपेट कर
इंसां के हक़ में देख शजर है कि नहीं है

अपने ही दिल में ख़वाब किसी और का है क्युं
दिल टूटने  का आप  को डर है कि नहीं है।

उल्फत  में  रोजगार में रिश्तों में उलझ कर।
हर   वक्त   बेकरार  बशर है कि  नहीं  है।

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...