Wednesday, November 12, 2014

जब से तेरा फ़ितूर मेरे सर पे चढ़ गया/

गजल हजल मिक्स कुछ हट के पहली और आखिरी

जब से तेरा फ़ितूर मेरे सर पे चढ़ गया/
हसरत की सीढ़ियों से मैं अम्बर पे चढ़ गया /

शीशे के थे आरमां मेरे पत्थर थी ये दुनिया ।
शीशा उठा के हाथ में पत्थर पे चढ गया ।

दर्दो सितम के खौफ से डरता है कौन अब ।
दिल देख ले मेरा तेरे खंजर पे चढ गया।

नेता को तो हर बूंद में हिस्सा ही चाहिये ।
पीता लहूं वो देख के मच्छर पे चढ गया

खादी के इन्कलाब से भागा था जो कभी।
ले कर के जिन्स पेण्ट वो खद्दर पे चढ गया ।

हिम्मत को हाथ की भी जरूरत नहीं पङी।
ठाकुर बगैर हाथ के गब्बर पे चढ गया ।

राजीव कुमार

दस्त दरिया फूल सबनम और सहरा हो गया।


दस्त दरिया फूल सबनम और सहरा हो गया।
आसमां में मैं ख्यालों का परिंदा हो गया।

लोग दौलत को जहां में क्या खुदा कहने लगे।
सबकी आंखों में खुदा का अक्स पैसा हो गया ।

देखने निकला मै जब इन्सानियत की शक्ल को।
मेरे भीतर का भी इक इंसान रुस्वा हो गया।

क्या गजब लिक्खा है मजहब की किताबों में बता
या बता दे शह्र में क्युं आज दंगा हो गया ।

माल ओ जर रोटी थी या खानाबदोशी जिन्दगी।
आखरी में दरअसल सब एक किस्सा हो गया।

जब फकीरी छोङ कर ये बादशाहत थाम ली।
तब मेरा किरदार ऊचां हो के बौना हो गया।

इश्क भी दिलचस्प है हो कर कभी छुपता नहीं।
क्या पङा उल्फत में मैं दुनिया में बलवा हो गया ।

राजीव कुमार

Saturday, November 1, 2014

जिन्दगी को भला और क्या चाहिये।

गजल आप की मोहब्बतों के हवाले---

जिन्दगी को भला और क्या चाहिये।
आग पानी जमीं औ हवा चाहिये।

छूट जायेगा सब कुछ यहां एक दिन।
हमको दौलत नहीं अब दुआ चाहिये।

हस्र है एक जैसा सभी का यहां।
आखिरी में सभी को खुदा चाहिये।

जो मय्यसर नहीं हो सका है कभी।
आशिकों को वही हर दफा चाहिये।

इश्क होता नहीं है फकत हुस्न से।
थोङी शर्मो हया कुछ अदा चाहिये।

सिर्फ मेहनत से मिलती नहीं नौकरी।
इसमें किस्मत भी तो मरहबा चाहिये।

बात हक की जबां से न कहना कोई ।
हुक्मरानों को बस इक खता चाहिये।

बह रहा है लहू रोज क्यूं हर कहीं।
ये भी इंसान को सोचना चाहिये।

शायरी कुछ ख्यालों से होती नहीं।
दिल में सैलाब उठता हुआ चाहिये

मरे दुश्मन भी कहने लगे आज कल।
दिल तेरे जैसा हमको बङा चाहिये।

रंजो गम झूठ नफरत बहुत हो चुका ।
इस जहॉ को जहां दूसरा चाहिये।

राजीव कुमार

उम्र भर इश्क में सिसकियों की तरह।

गजल ख्याले यार को नज्र  ______________

उम्र भर इश्क में सिसकियों की तरह।
मैं पिघलता रहा आंशुओं की तरह।

मुस्कुराने की है ख्वाहिसें अब मेरी ।
थोङा जी लूं मैं अब दूसरों की तरह।

रात भर ढूंढता क्या रहा क्या मिला ।
बावरा दिल मेरा जुगनुओं की तरह ।

फांसलों को बङाना भी मुम्किन नहीं।
सीने में है तु ही धङकनों की तरह।

ख्वाब में भी तेरी दीद हो जाये तो।
मन मचल जाता है मनचलों की तरह।

कैसा रिस्ता हैं ये तेरा मुझसे बता।
जिन्दगी तू है क्युं दुश्मनों की तरह।

ख्वाबों के आसमां हैं ख्यालों के पर।
चल उङें दूर तक पंछियों की तरह।

जब भी करता हुं मैं खुद से बातें तेरी।
बात होती है वो शायरों की तरह।

लाख सिकवे हैं पर ये भी सच बात है।
उसकी यादें भी हैं खुश्बूओं की तरह।

आके लग जा गले रंग दे जिन्दगी।
इस चमन की हसीं तितलियों की तरह।

राजीव कुमार

तेरे सर पर कोई इल्जाम रक्खा जायेगा इक दिन।

गजल पेश ए खिदमत तवज्जो तलब ___________

तेरे सर पर कोई इल्जाम रक्खा जायेगा इक दिन।
तू इन्सां है करम तेरा भी देखा जायेगा इक दिन।

गुनाहों के सिंघासन पर हैं बैठे बादशाह जितने
उन्हें मालूम हो उनको उतारा जायेगा इक दिन

परिन्दे भी निकल आयें हैं अब ये फैसला करके ।
इन्हीं पिजङों में सैय्यादो को पकङा जायेगा इक दिन।

रहम की भीख मांगेगा समंदर चीख कर मुझसे।
मेरा गुस्सा मेरे बाहर अगर आ जायेगा इक दिन।

अभी जिन्दा हुं इस बुनियाद पर उम्मिद करता हुं।
किला फिरका परस्ती का गिराया जायेगा इक दिन/

दिया जलता हुआ कहने लगा मुझसे मेरे यारों ।
कोई माने न माने ये अंधेरा जायेगा इक दिन ।

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...