दोस्तों मेरी नयी ग़ज़ल बशीर बद्र शाहब से प्रेरित___ पहली कोशिश _________
तुझे क्या कहूं तू है मरहबा. तेरा हुस्न जैसे है मयकदा
मेरी मयकशी का सुरूर है, तेरी हर नजर तेरी हर अदा
तेरे इख़्तियार में है फिजा, तू खिज़ां का जिश्म सवार दे
मुझे रूह से तू नवाज दे, मुझे जिंदगी से न कर जुदा
कभी रोशनी कभी बज्म में, तू जहाँ जहाँ मैं वहाँ वहाँ
तेरी खुश्बुओं के शहर में ही, फिरुँ बेखबर रहूँ गुमशुदा
तेरी चाहतों से चमन बने , जहाँ इश्क़ खिलता गुलाब हो,
मेरी हसरतों की ग़ज़ल बने , या बने तेरा कही बुतकदा
कोई रात हिज्र की न कटे, न मोहोब्बतों की शमा बुझे
मेरी आशिक़ी को कुबूल कर, तू मुआफ कर मेरी हर खता
_________ राजीव कुमार
तुझे क्या कहूं तू है मरहबा. तेरा हुस्न जैसे है मयकदा
मेरी मयकशी का सुरूर है, तेरी हर नजर तेरी हर अदा
तेरे इख़्तियार में है फिजा, तू खिज़ां का जिश्म सवार दे
मुझे रूह से तू नवाज दे, मुझे जिंदगी से न कर जुदा
कभी रोशनी कभी बज्म में, तू जहाँ जहाँ मैं वहाँ वहाँ
तेरी खुश्बुओं के शहर में ही, फिरुँ बेखबर रहूँ गुमशुदा
तेरी चाहतों से चमन बने , जहाँ इश्क़ खिलता गुलाब हो,
मेरी हसरतों की ग़ज़ल बने , या बने तेरा कही बुतकदा
कोई रात हिज्र की न कटे, न मोहोब्बतों की शमा बुझे
मेरी आशिक़ी को कुबूल कर, तू मुआफ कर मेरी हर खता
_________ राजीव कुमार