Thursday, March 27, 2014

तुझे क्या कहूं तू है मरहबा. तेरा हुस्न जैसे है मयकदा

दोस्तों मेरी नयी ग़ज़ल बशीर बद्र शाहब से प्रेरित___ पहली कोशिश _________

तुझे क्या कहूं तू है मरहबा. तेरा हुस्न जैसे है मयकदा
मेरी मयकशी का सुरूर है, तेरी हर नजर तेरी हर अदा

तेरे इख़्तियार में है फिजा, तू खिज़ां का जिश्म सवार दे
मुझे रूह से तू नवाज दे, मुझे जिंदगी से न कर जुदा

कभी रोशनी कभी बज्म में, तू जहाँ जहाँ मैं वहाँ वहाँ
तेरी खुश्बुओं के शहर में ही, फिरुँ बेखबर रहूँ गुमशुदा

तेरी चाहतों से चमन बने , जहाँ इश्क़ खिलता गुलाब हो,
मेरी हसरतों की ग़ज़ल बने , या बने तेरा कही बुतकदा

कोई रात हिज्र की न कटे, न मोहोब्बतों की शमा बुझे
मेरी आशिक़ी को कुबूल कर, तू मुआफ कर मेरी हर खता

_________ राजीव कुमार

कभी बारिश कभी बिजली कभी बादल समझते हैं

कभी बारिश कभी बिजली कभी बादल समझते हैं
हम उनकी आहटों को आज भी पायल समझते है

वो झुकती हर नज़र थी तीर अब तलवार हैं यादें
हमे अब लोग भी हारा हुआ घायल समझते है

लकीरें उसके चेहरे की अभी खामोश हैं शायद
छलकते अश्क़ न बोले मगर काज़ल समझते है

यक़ीनन दिल के दरवाजे को वो भी खोल ही देगा
के आशिक़ कब ज़माने को कोई हायल समझते है

मुझे रुशवाईयों से अब जरा भी डर नहीं लगता
मेरे मेहबूब ही मुझको कोई पागल समझते है

हायल - बाधक

राजीव कुमार

क्युं तू अन्जाम की परवाह किया करता है.

दोस्तों पेश है गीत_________

क्युं तू अन्जाम की परवाह किया करता है.
इश्क मरता नहीं इन्सांन मरा करता है।

ये हकीकत है कि ये दौर गुजर जायेंगे
हम भी तारीख के पन्नों से उतर जायेंगे
कोई जब इश्क की नजरों से कहीं देखेगा
उसकी यादों के झरोंखों मे नजर आयेगे।

बेसबब दिल भी तेरा युँ ही डरा करता है
इश्क मरता नहीं इन्सांन मरा करता है।

क्युं तू अन्जाम की परवाह किया करता है.
इश्क मरता नहीं इन्सांन मरा करता है।

राजीव कुमार

दिल में उनको रखा ये खता क्या हुई,

दिल में उनको रखा ये खता क्या हुई,
इक दिया इन निगाहों में जलने लगा/
उनकी उल्फत में हम क्या कहें क्या हुआ,
इश्क़ भी मोम जैसे पिघलने लगा/

बारिशें सहमी सहमी बरसती रहीं,
बिजलियाँ अपने धुन पर गरजती रहीं/
ये फिज़ा ये हवा सब खफा हो गये.
इस चमन का बदन भी  बदलने लगा/

रौशनी अब अंधेरों को मिलती नहीं,
आशिक़ों का है क्या कुछ नहीं कुछ नहीं/
जिश्म अपना नहीं रूह अपनी नहीं,
ख्वाहिशों का भी दम यूँ निकलने लगा/

ये जमाना पुराना फ़साना रहा,
फिर भी ये दिल दीवाना दीवाना रहा /
मंजिलें  रूठती मुस्कुराती रहीं,
उनके जानिब मगर दिल भी चलने लगा/

इम्तहां इश्क़ की और कितनी सहें
कुछ बताओ कहाँ और किससे कहें
ख्वाब भी रात को अब सताने लगे
जां तड़पने लगी जी मचलने लगा/

राजीव कुमार 

Wednesday, March 5, 2014

इन्क़लाब क्या है_____

इन्क़लाब क्या है_____

नसों में गर्म खून हर जवान, इन्क़लाब है
जो खीच ले जमीं पे असमान, इन्क़लाब है

दमन के ठोकरों से उठ के आधियाँ जो बन गयी
वो दर्द और सितम की दास्तान इन्कलाब है

जमीन बंजारों की है तो हौसले का हल चला
उगा दे इक नयी फसल किसान इन्क़लाब है

ये आग जुल्म की है तो हमे जला न पायेगी,
के जिश्म पे पड़े हर इक निशान इन्क़लाब है

महल तेरे ही हाथ से खड़े हुए है भूल मत
तू याद रख तेरा भी ये मकान इन्कलाब है

खामोश हैं जो लब तो तू तूफान सामने समझ
हक़ों की चाह में तो ये जबान इन्कलाब है

राजीव कुमार 

Sunday, March 2, 2014

मोहब्बत के मुक़दमे में खरा मुझको उतरना है

दोस्तों पेश है ताज़ा तरीन ग़ज़ल _________

मोहब्बत के मुक़दमे में खरा मुझको उतरना है 
मुअक्किल है मेरा ये दिल सवालों से उबरना है 

वफ़ा का जुर्म है अपना जमानत हो न पायेगी 
अदालत है ज़माने की गवाहों को मुकरना है 

दलीलें बे बे अशर होंगे कई इलज़ाम हैं मुझ पर 
सिकायत है जिन्हे मुझसे उन्हें इंसाफ करना है 

सजा देना तो दे देना मगर मुझको बता देना
मेरी यादों के किस्सों को कहाँ पर जा के मरना है

मेरे मुंसफ दो मोहलत फिर सम्भालूँ मैं मेरे दिल को
बहुत से हादसों को फिर मेरे दिल से गुजरना है

कचहरी कायदे कानून मुझसे सब खफा हैं क्यूँ
मोहब्बत के परिंदों के परों को फिर कतरना है

राजीव कुमार

बुरा है तो भला क्या है, खलिश है तो खला क्या है

बुरा है तो भला क्या है, खलिश है तो खला क्या है
सवालों से हुआ क्या है, सवालों में भला क्या है 

मुकद्दर अपने घर पे है, मुसीबत हर डगर पे है, 
जो होना है हुआ ही है, दुवाओं से टला क्या है/

जमाना जिद पे है कायम, नफासत हो गयी गायब, 
ये ही दौर ए तरक्की है, हवाओं में घुला क्या है/

भयानक है बड़ा मंजर, हर इक हाथों में है खंजर,
ये ख्वाहिश है की साजिश है,दिलों में ये पला क्या है/

शिकन माथे की गहरी है, मादर-ए-हिन्द कहती है,
गुलामी फिर से आनी है, गुलामों से गिला क्या है /

ये हुस्न ओ इश्क़ के जलवे, जहाँ जैसे हैं रहने दो,
यहाँ मेहनत से शोहरत है, अदाओं से मिला क्या है/

राजीव कुमार

*मादर-ए-हिन्द ---भारत माता
*दौर ए तरक्की--- आधुनिक युग

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...