तख्ती लेकर घर से निकलो जोर से बोलो डूब मरो
सरकारों में बैठने वालों कुर्सी छोङो डूब मरो
बस्ती-बस्ती मातम है और शह्रों-शह्रों वीरानी।
देखो आंखे खोल के देखो देख लिया तो डूब मरो
रहबर से उम्मीद लगा के क्यु बैठे हो उठ जाओ
वर्ना अगली नस्ल कहेगी हमको जाओ डूब मरो
गुलशन को शमशान बनाने वालों ये भी रखना याद
जलती लाशे ख्वाब में हर शब कहेंगी तुमको डूब मरो
इस वहशत के मंजर से अंजान भी हो और खुश भी हो
ऐसे झूठे लोगों को अब मुह पर कह दो डूब मरो
फस्ले गुल का वादा था पर ले आये सहराओं में
अच्छा जब आ पहुंचे हो तो कुछ मत पूछो डूब मरो
कोई मसीहा कोई मुसाहिब कोई सहाफी आयेगा
आप अभी तक इन सपनों में डूबे हो तो डूब मरो
अब तो घर से बाहर आ कर बोलना होगा हाकिम से
साहब हमको मार दो या फिर ऐसा कर लो डूब मरो
अपनी किस्मत अपने हाथों लिखने वाले जीतेगे
बहलावों में रहने वालों मेरी मानो डूब मरो
राजीव कुमार
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