Sunday, November 18, 2018

शह्र ए दिल्ली में है जो पी एम टू

ग़ज़ल

शह्र ए दिल्ली में है जो पी एम टू
सबकी सांसों में  है वो पी एम टू

गर ज़मीं पर रही तो मिट्टी है
घूल बन कर उड़ी तो पी एम टू

यूँ  हवाओं पे  है धुआँ हावी
इन हवाओं को बोलो पी एम टू।

एक सी एम है एक पी एम है।
मिल के बनते हैं दोनो पी एम टू।

फेफड़े चीखने लगे है पर
रात दिन पी रहे हो पी एम टू।

सारे चैनल पे सिर्फ पी एम है।
फिर भी दिखता है हमको पी एम टू।

राजीव कुमार

छोड़ के जब भी घर जाते हैं

छोड़ के जब भी घर जाते हैं
हमको तन्हा कर जाते हैं

सोच रहा हूं शाम ढले तो
बेघर लोग किधर जाते है।

पैर के छाले देख के अब तो
राह के ठोकर डर जाते हैं

आप के हाथों के ये पत्थर
मेरे ही क्यूँ सर जाते हैं

वो हंसते है देख के हमको।
हम ये देख के मर जाते हैं

इश्क नहीं आसान है लेकिन
करने वाले कर जाते हैं

राजीव कुमार

उल्फत में किसी का भी भला हो नहीं रहा

*ग़ज़ल*
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उल्फत में किसी का भी भला हो नहीं रहा।
इस काम  में अब और  नफा हो  नहीं रहा।

ग़म इसका नहीं शामो सहर पी रहे हैं हम।
इस बात का  है ग़म कि  नशा हो नहीं रहा।

इस दौर  में सब  झूठ के ही  साथ  हैं खड़े।
सच बोल कर किसी का भला हो नही रहा।

ये देख के  आना पड़ा  खुद  के ही  सामने।
कोई   मेरे   खिलाफ़  खङा  हो  नहीं  रहा।

वहशत  गुनाह  जुल्म  कज़ा  और साज़िशें।
दिल्ली  तेरे  निज़ाम  में  क्या  हो  नहीं रहा।

कुछ काम खुद भी आप मियां कर लिया करो।
हर   बात पे  कहते  हो  चचा  हो  नहीं  रहा।

अब   सोचता  हूँ  छोड़  दूं  ये   शेरो  शाइरी।
कोई  भी  शेर  आज   मेरा   हो  नहीं  रहा।

राजीव कुमार

ऐसा लगता था बचा लेगा मगर ले डूबा।

ग़ज़ल

ऐसा लगता था बचा लेगा मगर ले डूबा।
मुझको ख़ाली पड़ा वीरान सा घर ले डूबा।

फिर वही रात वही ख़्वाब वही तन्हाई ।
मेरी आंखों को इसी बात का डर ले डूबा।
 
एक मंज़िल जिसे पाने की हसीं ख़्वाहिश में
इस जवानी को जवानी का सफ़र ले ढूबा

आपको चाहते रहने के सुकूं को जांना।
आप से दूर हो जाने का असर ले डूबा ।

आज सूरज ने शरारत भी कुछ ऐसे की।
सुब्ह उगते ही सितारों का क़मर ले ढूबा।

इस हकीकत को कोई कैसे छुपा सकता है ।
जिसका फल खाया वही पेड़ बश़र ले ढूबा

राजीव कुमार

Thursday, November 1, 2018

मेरे दिल में उतर कर आज तक देखा नहीं तुमने।

ग़ज़ल

मेरे दिल में उतर कर आज तक देखा नहीं तुमने।
समन्दर की उदासी का सबब जाना नहीं तुमने

बहुत से फ़ैसले बाक़ी हैं क़िस्मत के तुम्हारे भी।
मैं जो भी खो चुका हुं वो अभी खोया नहीं तुमने।

मुझे कुछ भी नहीं हासिल हुआ उल्फ़त कि दुनिया में।
तुम्हें कुछ तो मिला होगा कभी बोला नहीं तुमने।

सँभलने के लिये पीता तो शायद जी नहीं पाता।
बहकने का मज़ा लोगों कभी समझा नहीं तुमने ।

हुआ ज़ख़्मी जिगर कैसे लगे ये चोट कब मुझको
कोई चाक़ू छुरी ख़ंजर कभी मारा नहीं तुमने ।

मैं अक्सर चाँद-तारों से तुम्हारा ज़िक्र करता हूँ ।
शबेग़म में कभी मुझको किया तन्हा नहीं तुमने।

मुहब्बत फूल से भौरे की है बस प्यास बुझने तक।
गुज़रती क्या है फूलों पर कभी सोचा नहीं तुमने।

हमेशा गर्दिशे अय्याम में जीना पड़ा लेकिन।
ख़ुदाया साथ मेरा भी कभी छोड़ नहीं तुमने ।

मुहब्बत की लड़ाई का ज़ुदा  दस्तूर है थोड़ा।
नहीं दिल जीत सकते हो जो दिल हारा नहीं तुमने।

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...