ग़ज़ल
शह्र ए दिल्ली में है जो पी एम टू
सबकी सांसों में है वो पी एम टू
गर ज़मीं पर रही तो मिट्टी है
घूल बन कर उड़ी तो पी एम टू
यूँ हवाओं पे है धुआँ हावी
इन हवाओं को बोलो पी एम टू।
एक सी एम है एक पी एम है।
मिल के बनते हैं दोनो पी एम टू।
फेफड़े चीखने लगे है पर
रात दिन पी रहे हो पी एम टू।
सारे चैनल पे सिर्फ पी एम है।
फिर भी दिखता है हमको पी एम टू।
राजीव कुमार
शह्र ए दिल्ली में है जो पी एम टू
सबकी सांसों में है वो पी एम टू
गर ज़मीं पर रही तो मिट्टी है
घूल बन कर उड़ी तो पी एम टू
यूँ हवाओं पे है धुआँ हावी
इन हवाओं को बोलो पी एम टू।
एक सी एम है एक पी एम है।
मिल के बनते हैं दोनो पी एम टू।
फेफड़े चीखने लगे है पर
रात दिन पी रहे हो पी एम टू।
सारे चैनल पे सिर्फ पी एम है।
फिर भी दिखता है हमको पी एम टू।
राजीव कुमार