Saturday, December 5, 2015

हसांते हैं रूलाते हैं सताते हैं मनाते हैं

फिलबदीह काव्योदय पर कही गजल
हसांते हैं रूलाते हैं सताते हैं मनाते हैं
हम अपनी जिन्दगी को हर घङी यूं आजमाते हैं
जबां है तल्ख जिनकी उनसे तो खतरा नहीं लेकिन ।
बहुत सीरी जबां वाले ही अक्सर मार जाते हैं
मुझे मिट्टी में जब चाहो मिला देना मगर सुन लो
फकीरों के मजारों पर ही सब चादर चढाते हे
कई दिन तक में अपने आप से कुछ कह नहीं पाता।
मगर कुछ दिन भी मुझसे फेर कर मुंह लौट जाते हे
नयी दुनिया नयी नस्लें नयी तहजीब है लेकिन ।
न जाने दोस्तों को लोग क्यूं दुश्मन बुलाते हैं
खिलाफत में हमारे इससे ज्यादा क्या कहेंगे वो।
जो हमको भी किसी दर्जे का अब शायर बताते हैं
राजीव कुमार

दश्त दरीया और सहरा की रवानी लिख गया

फिलबदीह गजल हाजिर
दश्त दरीया और सहरा की रवानी लिख गया
आसमां पर मैं जमीं की हर कहानी लिख गया।
गर कभी गलती से भी मैं हक बयानी लिख गया।
लोग कहने लग गये मैं बद जुबानी लिख गया
दौर ए नौ में धोती कुर्ता शेरवानी लिख गया।
मैं मेरी तहजीब की हर इक निशानी लिख गया
इश्क उल्फत जुल्फ शोखी और जवानी लिख गया ।
शायरी के नाम पर सब लंतरानी लिख गया
जब तस्वुर में तुम्हारा हुस्न आया जानेजां।
यक ब यक मैं गुल दुपहरी रात रानी लिख गया
हर्फ जिन्दा हो गये तेरी गजल के ए खुदा
तू दरख्तो पर परिन्दों की कहानी लिख गया ।
आज वो ही ले रहा हे लुत्फ अच्छे दिन के सब।
जो यहां वादों को जुमलों की जबानी लिख गया ।
राजीव कुमार
लंतरानी --- डींगे मारना

उठाओ लुत्फ यारों बेखुदी का ।

काफी दिनों बाद एक कोशिश
उठाओ लुत्फ यारों बेखुदी का ।
भरोसा कुछ नहीं है जिन्दगी का।
चरागे दिल जला के रख दिया है।
अंधेरा क्या करेगा रौशनी का।
किसी के इक इशारे पर तबाही ।
किसी से कुछ नहीं बिगङा किसी का।
नहीं टूटेगा तुमसे दिल हमारा।
तजुर्बा है हमें भी आशिकी का।
तुम अपने हुस्न की दौलत संभालो।
मैं कायल हुं किसी की सादगी का।
मुसलसल दास्तान ए गम सुना कर।
मैं कातिल बन गया था शायरी का ।
राजीव कुमार

सिवा तेरे जहां में दूसरा हो ही नहीं सकता

सिवा तेरे जहां में दूसरा हो ही नहीं सकता
कोई इन्सां कभी मेरा खुदा हो ही नहीं सकता।
मुहब्बत मौत मंजिल क्या तुझे मैं खो के पाउंगा।
किसी भी हाल में ये फैसला हो ही नहीं सकता।
ये दुनियां छोङ जाउंगा यकीनन एक दिन मैं भी।
मगर ता जिन्दगी तुझसे जुदा हो ही नहीं सकता ।
राजीव कुमार

तङप कर रोज खुद से पूछता हुं ।

गजल पेश ए खिदमत तवज्जो तलब
🙏🏻🙏🏻🙏🏻
तङप कर रोज खुद से पूछता हुं ।
मैं तन्हा क्युं अभी तक जी रहा हूं।
जूदा होकर ही मैं भी जान पाया
तुम्हे ही ख्वाब में क्युं ढूंढता हुं ।
तुम्हारा नाम ही नीकळे जुबां से
मैं जब भी नींद में कुछ बोलता हुं ।
मुकम्मल हो नहीं पाया कभी भी।
कोई पेंचीदा किस्सा बन गया हुं
जिसे जो भी समझना है वो समझे।
मैं दिल की बात सारी कह चुका हूँ।
राजीव कुमार

तू कभी मुझसे भी मिली हे क्या

तू कभी मुझसे भी मिली है क्या
 तेरा ही नाम ज़िन्दगी है क्या

मेरी क़िस्मत में हर ख़ुशी है क्या ।
तू मेरे वास्ते बनी है क्या।

तू मिरे जिस्मो जान में जानां।
रूह बन कर उतर गयी है क्या।

ये जो करते हैं इश्क इन सब से 
सारी दुनिया से दुश्मनी है क्या

दिन बिछङने का था मुकर्रर जो
यार वो दिन भी आज ही है क्या

ऐसा लगता है थक गया हुं मैं
ये घङी आखिरी घङी है क्या

सब उजालों से डरने वाले हैं
अब अंधेरों की रहबरी है क्या

राजीव कुमार

मेरे गम नहीं मुझको तन्हा करेंगे

फिलबदीह
मेरे गम नहीं मुझको तन्हा करेंगे
ये हर हाल में साथ मेरे रहेंगे
जूदा हो गये आप ये जान कर भी
बिना आप के हम नहीं जी सकेंगे
हवा की खिलाफत हैं आज सारे।
दिये अम्न के ऐसे कैसे जलेंगे
वफा या जफा तुम जो चाहो वो कर लो
मुहब्बत मेरी जां तुम्ही से करेगे।
कोई न कोई गम हर इक शक्स को है।
कहां तक हम हर हाल में खुश रहेंगे
राजीव कुमार

नहीं पूछिये राज मेरी खुशी का

नहीं पूछिये राज मेरी खुशी का
मजा लीजिये आप भी तिस्नगी का
ये खानाबदोशी ये रोटी कमाई ।
बहुत बेरहम खेल है जिन्दगी का ।
किसानों की खातिर ये बरिस का मौसम।
सबब बन न जाये कहीं खुदकुशी का
जरा फांसले से मिलो आप सबसे।
भरोसा किसी को नहीं हे किसी का।
मुहब्बत मुहब्बत जो चिल्ला रहे हैं।
उन्हें कुछ पता ही नहीं आशिकी का।
सूकुं दिल को मिलता नहीं है कहीं भी
हुआ जब से है रोग दीवानगी का।
राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...