Monday, December 1, 2014

आने से पहले मौत मजा चाहते हैं लोग।

गजल-राजधानी दिल्ली के एम्स हस्पताल से होते हुए आप तक
आने से पहले मौत मजा चाहते हैं लोग।
हर कर्ज जिन्दगी का अदा चाहते हैं लोग
ये भीङ हस्पताल की कहती है चीख कर।
दर्दों के सताये हैं दवा चाहते हैं लोग।
दुनियां में लाईलाज मर्ज जब से हो गये।
तब से दवा के साथ दुआ चाहते हैं लोग।
कंधे पे ढो रहे हैं खुद अपने ही जिस्म को।
सीने में जिन्दगी की हवा चाहते हैं लोग।
आखिर में जंग हारने का गम नहीं कोई।
जीने का वक्त और जरा चाहते हैं लोग।
दिल के मरीज जितने थे सबने यही कहा।
हर रोज जख्म दिल पे नया चाहते है लोग।
जाने भी दीजिए मैं गजल और क्या कहुं।
अश्कों से जो निकले वो सदा चाहते हैं लोग ।
राजीव कुमार

हुआ सख्त है तब बगावत का लहजा।

उन्वान पर कोशिश

हुआ सख्त है तब बगावत का लहजा।
तिजारत बनी जब हूकूमत का लहजा।

जूबां पे नफासत मगर दिल में शोले ।
यही आजकल है सियासत का लहजा ।

वही जूर्म सारे अदालत वही हैं।
सभी को पता है वकालत का लहजा

तरक्की के इस दौर की है हकीकत।
सदाकत नहीं है सदाकत का लहजा ।

सिखाया नहीं बैर मजहब ने तो फिर।
है क्यूं हर किसी का अदावत का लहजा।

जरूर एक दिन आयेंगे अच्छे दिन भी ।
मगर पहले सीखो मुहब्बत का लहजा ।

राजीव कुमार

मैं भी इक दिन जवाब दे दुंगा।

एक मतला और कुछ 🐅

मैं भी इक दिन जवाब दे दुंगा।
सबको सबका हिसाब दे दुंगा।

सारे किस्से कहानियों की मैं।
लिख के कोई किताब दे दुंगा।

ए समंदर मैं आज सहरा को।
तेरे हिस्से का आब दे दुंगा।

जिनसे आंखो की शर्म रखता था।
उनको आंखो से ताब दे दुंगा।

मुफलीशी जब कभी तू मांगेगी।
अच्छे दिन के खुवाब दे दुंगा।

वक्त तारीख कोई बन कर मैं।
कुछ तुझे भी खराब दे दुंगा।

तितलियां दर ब दर न होना तुम।
तुमको खिलता गुलाब दे दुंगा।

आइना सच बता न पायेगा ।
मै हर इक को नकाब दे दुंगा।

राजीव कुमार

मेरा वजूद भी अब तक मिटा नहीं पाया ।

नयी गजल पेश ए खिदमत

मेरा वजूद भी अब तक मिटा नहीं पाया ।
सफर हयात का मुझको थका नहीं पाया ।

गुलों से खुश्बू ए गुलसन उङा नहीं पाया ।
वो भौरा रंगत ए गुल भी चुरा नहीं पाया।

हजार जख्म थे सीने पे इस लिये शायद।
नजर रकीब भी मुझसे मिला नहीं पाया।

मेरा मिजाज भी कुछ उस दरख्त जैसा है।
कोई तूफान भी जिसको गिरा नहीं पाया ।

बहुत से रहनुमा आये हमारी बस्ती में।
कोई भी झुग्गीयां लेकिन हटा नहीं पाया।

न जाने कैसे वो अच्छे दिनों को लायेगा।
जो अम्नो चैन अभी तक तो ला नहीं पाया।

वो जिसके नाम के पत्थर भी तैर जाते थे।
वही तो नाव भी अपनी बचा नहीं पाया।

तङपते भूख से बच्चो को आज तक शायर।
कलाम अपने सुना कर हसा नहीं पाया।

हर एक हाल मे जिन्दा वफा रही मेरी ।
तिरंगा मेरा वो दुश्मन झुका नहीं पाया ।

राजीव कुमार

मेरे दिल में उतर कर रह गया हैं

ताजा गजल आप सभी के लिये

मेरे दिल में उतर कर रह गया हैं
तेरी यादो का नश्तर रह गया है

जो तेरे संग बीता था वो लम्हा।
वही आंखों में मंजर रह गया है

जला हे दिल मेरा उल्फत में जब से।
धुआं सिने के अन्दर रह गया है

मेरे उपर उछाला हर किसी ने।
तेरे हाथों में पत्थर रह गया हे।

सफर पर साथ तो निकला था मेरे।
मगर रस्ते में रहबर रह गया है।

किया है कत्ल जबसे दुश्मनी का।
बहुत मायूस खंजर रह गया है।

जरा बदली जो छायी आसमां में ।
सहम कर मेरा छप्पर रह गया है।

खुदाया इस जहां में हर कोई क्युं।
मसाइल में उलझ कर रह गया हैं।

इसी दुनिया में ये इन्सान भी तो।
फकत सर्कस का जोकर रह गया है।

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...