Monday, April 28, 2014

इनके हिस्से में खुशी कितनी दर्द कितना है,

नयी गज़ल़

इनके हिस्से में खुशी कितनी दर्द कितना है,
इन किसानो से ना पुछो कि कर्ज कितना है/

वो जो सोते है रजाई में वो बता देंगे,
इन गरीबो से न पूछो कि सर्द कितना है।

हम को अब दिल की दवा दे दो हम तड़पते है,
हम बिमारों से ना पूछो कि मर्ज कितना है/

जिसको चाहें खरीद लें दुआ की दौलत से,
हम फकीरों से न पूछो कि खर्च कितना है/

राजीव कुमार

Thursday, April 24, 2014

शायरी हो तो वो हो जाये आशिक़ों वाली

दोस्तों एक नयी ग़ज़ल आप सभी के लिए ________

रंजिशें नफ़रतें तलवार खंजरों वाली
ऐसी बातों की हर ग़ज़ल हो जाहिलों वाली

शायरी हो तो वो हो जाये आशिक़ों वाली
इश्क़ की बात हो कुछ ऐसी पागलों वाली

लबों रुखसार, हुस्न उनका क्या कहें यारों
फूल को लब नज़र को लिक्खो कातिलों वाली

उनकी जुल्फों की घनी छाँव का असर देखो
ये फिज़ा आज भी लगती है बादलों वाली

जब भी यादो में उनके अश्क़ छलक जाये तो
खूश्बू मिट्टी की  महक उट्ठे बारिशों वाली

अब तो सैलाब ही सोचे कि क्या करेगा वो
ये मोहब्बत की कश्तियाँ हैं हौसलों वाली

राजीव कुमार


Monday, April 14, 2014

वक़्त तब कुछ और था ये जिंदगी कुछ और थी

वक़्त तब  कुछ और था ये जिंदगी कुछ और थी
वो तेरी पहली नज़र वो दिल्लगी कुछ और थी

आग पानी फूल तितली बिजलियाँ रंगीनियाँ
चाँद सूरज सब वही थे रौशनी कुछ और थी

इस शहर के मयकदों में जी रहा हूँ आज कल
पर तुम्हारे इश्क़ की वो मयकशी कुछ और थी

सच है ये भी रात दिन मिलता हूँ सबसे पर सनम
ख्वाबों में  दीदार वाली आशिक़ी कुछ और थी

अब किसी का डर नहीं दुनिया समझता हूँ मगर
"कर न दो इनकार तुम" वो बेबसी कुछ और थी

सज रहे है हर जगह अब इश्क़ भी बाजार भी
याद है मुझको तुम्हारी सादगी कुछ और थी _______राजीव कुमार 

Tuesday, April 8, 2014

उम्र का साथ भी इक पल में बिछड़ जाता है

उम्र का साथ भी इक पल में बिछड़ जाता है
रिश्ता बुनियाद से कमजोर उखड जाता है

बात तो हद से गुजरती है तब की जब वो भी
मेरी खुशियों को देख मुझपे बिगड़  जाता है

कितने पैबन्द लगे हैं वफ़ा के कपड़ों में
बस नुमाइश ही करें तो भी उधड़ जाता है

जिंदगी रोज ही लड़ती है जिन्दा रहने को
हर बुरे दौर का किस्सा भी पिछड़ जाता है

शक़ के फितरत की बीमारी की अब दवा ले लो
खांसते खांसते सीना ये जकड जाता है

आज ही कर लो अभी कर लो इस मोहोब्बत को
मौत के बाद तो ये जिश्म अकड़ जाता है

उनका पत्थर है दिल तो ये भी हकीकत है की
कुंवे की रस्सी से पत्थर भी रगड़ जाता है

यूँ ही बदनाम सियासत को न करो कोई  
मुल्क बनता है सियासत से बिगड़ जाता है

राजीव कुमार 

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...