Thursday, January 23, 2014

इश्क़ वाले, मेरे किस्सों, की दुहाई देंगे/

तेरी यादें, मैं हूँ जिन्दा, की गवाही देंगे,
इश्क़ वाले, मेरे किस्सों, की दुहाई देंगे/

न जगा,कैद है चेहरा,तेरा मेरी आँखों में,
ये उजाले ,मुझे तुझसे, ही रिहाई देंगे /

अश्क सीन में, दबा लूँ, फिर भी डर लगता है
दूर से, जख्म ए जिगर, मेरे दिखाई देंगे/

तुमसे हारा हूँ, तो हारा हूँ, चलो अच्छा है,
अब तो दुश्मन भी मेरे मुझको बधाई देंगे

जाम तो, नाम से बदनाम है, जमाने में,
इस लिये,जश्न-ए-तबाही में, मिठाई देंगे/

आग से आग, बुझाते है, हुनर उनका है,
हम भी अब, आंख के शोलों को, हवा ही देंगे/

मौत आती है तो आ जाये कौन डरता है,
इश्क करते थे, करेंगे, न सफ़ाई देंगे/

बेवफ़ा हो हसीन हो खुदा नहीं हो तुम,
मेरे हिस्से की सजा मुझको ,खुदा ही देंगे

यार मेरे जिन्हे कम्बख्त कहा करता था,
वो ही जख्मो को मेरे फिर से दवाई देंगे/_

काश के आस का अहसास अभी जिन्दा है,
मेरे अपने मुझे देंगे तो दुआ ही देंगे/

शेर ग़ज़लों की भी लफ़्ज़ों से मेरे अन-बन है,
इश्क़ से होंगे शुरू फिर भी जुदाई देंगे/

राजीव कुमार 

Thursday, January 16, 2014

15 जनवरी को मेरे जन्मदिवस पर मेरे बहुत सारे मित्रों ने मुझे बधाई सन्देश दिए और सुभकामनाये भी दी. उन सभी मित्रों को दिल की गहराइयों से मेरा धन्यवाद और आभार स्वरुप भेंट है ये ग़ज़ल


15 जनवरी को मेरे जन्मदिवस पर मेरे बहुत सारे मित्रों  ने मुझे बधाई सन्देश दिए और सुभकामनाये भी दी. उन सभी मित्रों को दिल की गहराइयों से मेरा धन्यवाद और आभार स्वरुप भेंट है ये ग़ज़ल

सराफत छोड़ देता तो इलेक्शन लड़ गया होता
सियासत पर नहीं लिखता अगर मैं डर गया होता

कमाई से भी ज्यादा खर्च है ईमान रखने में,
समझ जाता तो अब तक दौलतों से तर गया होता/

वफ़ा ज्यादा जरुरी है किसी के इश्क़ से पहले,
अगर पहले पता होता मोहब्बत कर गया होता/

अभी भी दूर रहता हूँ हसीनो की अदाओं से
मैं जो भी हूँ,नहीं होता जो इनके दर गया होता/

ख़ुदा मिलता नहीं है ईंट पत्थर के मकानो में,
अगर मिलता तो मैँ हर एक पत्थर पर गया होता/

दुवाओं ने सम्भाला है मुझे जिन्दा भी रक्खा है,
न  होते जो तुम मेरे यारों तो कब का मर गया होता/

राजीव कुमार

Saturday, January 11, 2014

हमे हुकूक चाहिए,

जो है हमारा लेंगे हम,
दमन नहीं सहेंगे हम 
मुकद्दरोँ से रहमतों को,अब नहीं है मांगना,
असल हुकूक क्या है अब,वही है हमको जानना/
हमे हुकूक चाहिए,
हमे हुकूक चाहिए

वो कौन हैं जो नफरतों के बीज हम में बो गए,
हुकूमतों में बैठ कर तिज़ारतों में खो गए,  
उन्ही की बेरुखी से हम हैं भूख के चपेट में,
भरोसे के निवाले ही हैं अब हमारे पेट में /
सवाल अब करेंगे हम,
जियेंगे या मरेंगे हम,
बिना जवाब के तो अब नहीं है हमको मानना ,
असल हुकूक क्या है, अब वही है हमको जानना/
हमे हुकूक चाहिए,
हुकूक चाहिए हमे /

वतन के इज्ज़तों पे है नजर गड़ाए भेड़िया,
इन्ही के राज में पड़ी हैं बेटियों को बेड़ियां/
ये तन पे आज नारियों के चोट के निशान क्यों,
बदन बदन हुए हैं बस हवस के ही गुलाम क्यूँ ,
तू बेवा है बहु भी है ,
लड़ाई है लहू भी है/
हर एक जुल्म का है, अब हमे हिसाब मांगना /
असल हुकूक क्या है, बस वही है हमको जानना/ 
हमे हुकूक चाहिए,
हुकूक चाहिए हमे /

रहम की आस में रहा तो,घर तेरा जलेगा अब,
सिसकता ही रहेगा तो, तू ही यहाँ मरेगा अब,
खुशी नहीं मिलेगी मांग कर जहां में जान ले,
कोई न कुछ कहेगा न सुनेगा अब ये मान ले,
तू अपने डर को मार दे,
खुदी को खुद उबार दे
किसी के खौफ को भी अब हमे नहीं है मानना,
असल हुकूक क्या है, अब वही है हमको जानना/
हमे हुकूक चाहिए,
हुकूक चाहिए हमे /

मुकाम अपने नाम पर नहीं हुआ तो क्या हुआ,
किसी की रहबरी से आज तक भला कहाँ हुआ/
फसल भी अम्न की कही अभी तलक उगी नहीं,
बिना लड़े किसी को जिंदगी कभी मिली नहीं/
उठेंगे न झुकेंगे हम,
कि अब नहीं रुकेंगे हम ,
सीतम के सरहदों के हद, को भी है हमको नापना.
असल हुकूक क्या है, अब वही है हमको जानना/
हमे हुकूक चाहिए,
हुकूक चाहिए हमे /

नजर उठा के देख ले समय को और हालत को,
निहत्थों की कभी नहीं सुनी गयी है बात को/
कटार अपने म्यान से,तू क्यूँ नहीं है खींचता , 
बिना लहू बहे कोई नहीं है जंग जीतता 
न और इंतज़ार कर
की उठ के तू प्रहार कर,
तू कर ऐलान-ए-जंग, मिल के हम करेंगे सामना/
असल हुकूक क्या है, अब वही है हमको जानना/
हमे हुकूक चाहिए,
हुकूक चाहिए हमे /

जो है हमारा लेंगे हम,
दमन नहीं सहेंगे हम 
मुकद्दरोँ से रहमतों को,अब नहीं है मांगना,
असल हुकूक क्या है अब,वही है हमको जानना/
हमे हुकूक चाहिए,
हमे हुकूक चाहिए

राजीव कुमार

Thursday, January 9, 2014

किसानो की किसानी क्या है ये कर्ज़ा बताता है,


किसानो की किसानी क्या है ये कर्ज़ा बताता है,
बीमारी थी भयानक आज कल ख़र्चा बताता है/

दवा दारु के बाज़ारों का मौसम भी गुलाबी है,
हकीमो के यहाँ बीमार का पर्चा बताता है

जमाना किस तरह बनता है दुश्मन इश्क़ का अक्सर,
गरम अफवाह से बाज़ार का चर्चा बताता है/

हर एक ओहदे की अपनी हैसियत होती है दफ्तर में,
असल कीमत मगर ईमान का दर्ज़ा बताता है/

राजीव कुमार

Saturday, January 4, 2014

मुहब्बत ख़ुद नहीं मरती तिज़ारत मार जाती है। तुम्हारे शह्र में हमको शराफत मार जाती है ।

ग़ज़ल

मुहब्बत ख़ुद नहीं मरती तिज़ारत मार जाती है।
तुम्हारे  शह्र में हमको  शराफत मार जाती है ।

मसाइल में घिरी रहती है सबकी ज़िंदगी लेकिन ।
हुनर, औकात से ज्यादा की चाहत मार जाती है।

गले मिलते हैं होली पर ज़हन में ईद को रख कर।
ये रिश्ते यूँ नहीं मरते सियासत मार जाती है।

किसी भी मुल्क़ की ताकत वहाँ तालीम है यारों।
हो गर बुनियाद कच्ची तो ईमारत मार जाती है ।

हम अपने दुश्मनों के हाथ से मरते नहीं लेकिन ।
हमे फिरका परस्ती की विरासत मार जाती है।

राजीव कुमार

Wednesday, January 1, 2014

मैं अच्छा हूँ अच्छाई हूँ, बुरा हूँ मैं बुराई हूँ

मैं अच्छा हूँ अच्छाई हूँ
बुरा हूँ मैं बुराई हूँ
मैं सच के साथ झूठा हूँ
मैं सच्चा हूँ सच्चाई हूँ,

मेरा ईमान कच्चा  है,
हर इक इंसान बच्चा है/
मेरा  मजहब नहीं कोई ,
मैं हिन्दू  हूँ  ईसाई हूँ /

दवा हूँ सब मरीजों का,
मैं दारु हूँ रहीसों  का/
किसी का जिस्म भी हूँ मैं,
मैं दिल भी हूँ दुहाई हूँ/

कही गुमनाम भी हूँ मैं ,
कहीं बदनाम भी हूँ मैं /
नहीं सैतान है मुझसा,
मैं कातिल हूँ कसाई हूँ/

सभी का इश्क़ भी हूँ मैं
वफ़ा मुझसे ही है सबको/
मगर अंजाम मेरा है ,
मोहब्बत हूँ जुदाई हूँ

सलाखो में पड़ा हूँ मैं,
निगाहों में गड़ा हूँ मैं /
नहीं मालूम है उनको
मैं कैदी हूँ रिहाई हूँ

मैं पैसा हूँ मैं दौलत हूँ,
मैं चाहत मैं ही सोहरत हूँ
ज़माने का हक़ीक़त हूँ
खुसामद हूँ अकीकत हूँ

© राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...