नयी ग़ज़ल
कहां चलता है कोई आस्था पर
सभी कायम हैं अपनी धूर्तता पर
मैं अपना घर भी इक दिन खोदता पर
हसीं आती है ऐसी मूर्खता पर
ज़मीं में दफ्न है जो इक सदी से
किसे विश्वास है उस देवता पर
अदालत है या है तलवार कोई
जो लटकी है हमारी एकता पर
हमारा घर उजाड़ा जा रहा है
कोई ये क्युं नहीं है सोचता पर
नई नस्लें जो उड़ना चाहती हैं
इन्हीं का क्युं कोई है काटता पर
गली कूचे लहू से सन गये हैं
मगर है जश्न यारों रेख़्ता पर
राजीव कुमार
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