Saturday, December 14, 2024

कहां चलता है कोई आस्था पर

नयी ग़ज़ल 

कहां चलता है कोई आस्था पर 
सभी कायम हैं अपनी धूर्तता पर 

मैं अपना घर भी इक दिन खोदता पर
हसीं आती है ऐसी मूर्खता पर

ज़मीं में दफ्न है जो इक सदी से
किसे विश्वास है उस देवता पर

अदालत है या है तलवार कोई 
जो लटकी है हमारी एकता पर

हमारा घर उजाड़ा जा रहा है 
कोई ये क्युं नहीं है सोचता पर

नई नस्लें जो उड़ना चाहती हैं
इन्हीं का क्युं कोई है काटता पर

गली कूचे लहू से सन गये हैं 
मगर है जश्न यारों रेख़्ता पर 

राजीव कुमार
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