Tuesday, November 12, 2024

मुझ पर यकींन कर लें मुझे मान जायें सब

ग़ज़ल 

मुझ पर यकींन कर लें मुझे मान जायें सब 
इस बार मुझे ठीक से पहचान जायें सब

ऐसा भी नहीं है कि कोई राज हूं गहरा
ऐसा भी नहीं है कि मुझे जान जायें सब

उल्फ़त तजुर्बेकार के बस का सफर नहीं 
इस रास्ते पे जायें तो नादान जायें सब

वो जा रहे थे और मैं ये सोच रहा था।
काबा ए आशिकी से ये कुफरान जायें सब

कालेज पढ़ाई नौकरी शादी सब आम हैं 
वो काम हो जो देख के हैरान जायें सब

मुश्किल पसंद हैं जो वही लोग बस रुकें 
महफ़िल में जितने लोग हैं आसान जायें सब

घर में हो चाहे ज़हन में नाकाबिले पसंद
कूड़े में ऐसे फालतू सामान जायें सब

ये शह्र आप का है रहे आप का मगर 
जंगल से अब हमारे भी इंसान जायें सब

राजीव कुमार

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