मुझ पर यकींन कर लें मुझे मान जायें सब
इस बार मुझे ठीक से पहचान जायें सब
ऐसा भी नहीं है कि कोई राज हूं गहरा
ऐसा भी नहीं है कि मुझे जान जायें सब
उल्फ़त तजुर्बेकार के बस का सफर नहीं
इस रास्ते पे जायें तो नादान जायें सब
वो जा रहे थे और मैं ये सोच रहा था।
काबा ए आशिकी से ये कुफरान जायें सब
कालेज पढ़ाई नौकरी शादी सब आम हैं
वो काम हो जो देख के हैरान जायें सब
मुश्किल पसंद हैं जो वही लोग बस रुकें
महफ़िल में जितने लोग हैं आसान जायें सब
घर में हो चाहे ज़हन में नाकाबिले पसंद
कूड़े में ऐसे फालतू सामान जायें सब
ये शह्र आप का है रहे आप का मगर
जंगल से अब हमारे भी इंसान जायें सब
राजीव कुमार
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