कहीं खंजर कहीं पत्थर रहा है
महब्बत का यही मंजर रहा है
जहां के कायदों से डर रहा है
मेरे भीतर का शायर मर रहा है
उसे दुनिया समझ आयेगी कैसे
जो बंदा सिर्फ अपने घर रहा है
ज़मीं पर क़ैद हैं सारे परिंदे
वो जिनका घर कभी अम्बर रहा है
उसी से हो गया है इश्क़ मुझको
मुकाबिल जो मेरे अक्सर रहा है
नहीं पापा रहे पर है सकूं ये
मेरे सर पर भी इक छप्पर रहा है
वही साधू है अब इस दौर में जो
पुराने दौर में अजगर रहा है
सितम दिल पर हमारे करने वालों
ये फ्लावर भी कभी फायर रहा है
राजीव कुमार