ताजा गज़ल
सियाह रात से निकलें तो ख़ुश रहें हम भी
ग़म-ए-हयात से निकलें तो ख़ुश रहें हम भी
जो दिल के दर्द लहू से ग़ज़ल में लिक्खे हैं
वो काग़ज़ात से निकलें तो ख़ुश रहें हम भी
कभी उम्मीद कभी आरज़ू कभी चाहत
अब इस बिसात से निकलें तो ख़ुश रहें हम भी
ये ज़ख़्म ज़ख़्म नहीं हैं, जूनून है अपना
इस एक बात से निकलें तो ख़ुश रहें हम भी
सँवरना उनका और उस पर मचल के यूँ चलना
वो एहतियात से निकलें तो ख़ुश रहें हम भी
सभी से इश्क़, सभी से वफ़ा, सभी की मदद
हम अपनी ज़ात से निकलें तो ख़ुश रहें हम भी
किसी जहां में सुकूं हमको मिल नहीं सकता
सो क़ायनात से निकलें तो ख़ुश रहें हम भी
हम ऐसे लोग जो आशिक़ हैं और शायर भी
वो इस जमात से निकलें तो ख़ुश रहें हम भी
ख़िलाफ़ ज़ुल्म के हर बार जंग लिखने को
कलम, दवात से निकलें तो ख़ुश रहें हम भी
राजीव कुमार
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