Saturday, October 7, 2017

किसी भी तौर से बेकारियां नहीं चलतीं

तरही ग़ज़ल
बह्र - 1212/1122/1212/22

किसी भी तौर से बेकारियां नहीं चलतीं
ग़मों की भीड़ में लाचारियां नहीं चलतीं।

बहुत से लोग मुहब्बत में भूल जाते हैं
वफ़ा की राह में मक्कारियां नहीं चलतीं ।

हमारे दिल में ज़माने का दर्द है साहिब।
हमारे सामने ग़मख़्वारियां नहीं चलतीं

अना को जीत के खुद को है हारना इसमें
दिलों के खेल में खुद्दारियां नहीं चलतीं

ज़मीं पे चलते अगर हुक्मरान अपने तो
ज़मीने-मुल्क पे दुश्वारियां नही चलतीं

दुआ सलाम सलीक़ा सुख़न में हैं जायज़
अदब के नाम पे अय्यारियां नहीं चलतीं।

राजीव कुमार
Rajeev Kumar
raj28094gmail.com

Monday, October 2, 2017

फकत खुदा ही नहीं हां बशर भी शामिल है

ग़ज़ल
बह्र 1212 1122 1212 22

फकत ख़ुदा ही नहीं हां बशर भी शामिल है
मकान ए जिस्म में जैसे जिगर भी शामिल है

हको हकूक की बातें तो करता हूं लेकिन
मैं सच कहूं तो मिरे सच में डर भी शामिल है

हर इक सफर में फकत मुश्किलें नहीं होती।
किसी किसी में हसीं राहबर भी शामिल है

खुदा के घर हैं ये दैरो हरम मगर देखो।
श़हर की आग में इनका शरर भी शामिल है

तेरा हिसाब करोड़ों का हो गया लेकिन
तेरे हिसाब में मेरा शिफ़र भी शामिल है

तुम्हारे हुस्न में इक तुम ही तो नहीं जाना
तुम्हारे हुस्न में मेरी नजर भी शामिल है

राजीव कुमार

शिफर=शून्य

झूठ जब से आप का सन्नाम है

ग़ज़ल

झूठ जब से आप का सन्नाम है
सच हमारा तब से ही बेकाम है

दौरे हाजिर में किसी की दोस्ती
यूं समझिये आप से कुछ काम है

इक सदी इक साल कहते हो जिसे
कुछ नहीं वो सिर्फ सुब्हो शाम है

हां वही मैं आदमी हूं दोस्तो
आप की खातिर जो बिल्कुल आम है

अक्ल दो कौड़ी की होके रह गयी
चापलूसी का ही अच्छा दाम है

मीडीया में आज कल का मसअला।
या तो हिन्दू है या फिर इस्लाम है

खूं जला के क्या कमाया बोलिये
आखिरी पैसा है या फिर नाम है ?

राजीव कुमार

सच बताउं आप को संसार का

सच बताउं आप को संसार का
झूठ के आगे है सच बेकार का

डूबती हैं मुफलिसों की बस्तीयां।
किस तरह का जस्न है सरकार का

दफ्तरों के चक्करों में घुट गया
देख लीजे दम किसी लाचार का

नाम से पहचानता ही कौन है
अब जमाना है मियां आधार का

पेन पेन्सिल कुछ किताबें तख्तींयां
छोड़ीये अब काम क्या हथियार का

मंच पर चमचागीरी करते रहो
फन यही है आज के फनकार का

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...