Friday, February 20, 2015

खुदा की मुझ पे रहमत हो गयी है

*आप को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं*

ख़ुदा की मुझ पे रहमत हो गयी है
फ़कीरी मेरी शोहरत हो गयी है।

जिसे मुझसे शिकायत हो गयी थी
उसे मुझसे मुहब्बत हो गयी है

लगे कटने शजर जब से यहां पर
परिंदों को मुसीबत हो गयी है

हे जिनके हाथ में परचम अमन का।
उन्हीं की आज दहशत हो गयी है

तितलियाँ आ रहीं हैं तेरी जानिब।
गुलों सी तेरी रंगत हो गयी हे ।

किया है क़त्ल जब से बुज़दिल का।
रक़ीबों से मोहब्बत हो गयी है।

किसी के पास तूफ़ां है तो लाये ।
मुझे मिलने की हसरत हो गयी है

गिरावट देख कर किरदार में अब।
पढे-लिक्खों से नफ़रत हो गयी है

हुई हिम्मत जवां तो यार मेरे
मुक़द्दर को फ़ज़ीहत हो गयी है

वफ़ा ईमान ग़ैरत क्या सँभालूँ ।
बङी मुश्किल रिफ़ाक़त हो गयी है।

*दिया दिल में मेरे जलने लगा तो ।*
*दिवाली ख़ूबसूरत हो गयी है*

राजीव कुमार

रिफ़ाक़त-- दोस्ती

फूलों की चाह छोङ के पत्थर उठा लिया ।

एक गजल आप सभी की मोहब्बतों के हवाले
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फूलों की चाह छोङ के पत्थर उठा लिया ।
देखो हर इक सवाल का उत्तर उठा लिया ।
अदने से आदमी ने की हिम्मत तो देखिये।
लड़ने को इक पहाड़ से कंकड़ उठा लिया ।
ले कर जो चल रहे थे नसीबों के कारवां ।
उनके ही घर से उनका मूकद्दर उठा लिया ।
सैलाब जिन्दगी के समंदर में जब उठा ।
हमने भी अपने नाव का लंगर उठा लिया।
हर सिम्त रहजनों की हूकूमत को देख कर।
कंधे पे राहगीर ने रहबर उठा लिया ।
ईमान में कुछ जान तो बाकी थी इस लिये।
दुनियां ने सूट फैंक के मफलर उठा लिया ।
राजीव कुमार

अच्छे दिनों की बात से देखो मुकर गये ।

एक फिल बदीह गजल
अच्छे दिनों की बात से देखो मुकर गये ।
देखो वो काले धन के भी सौ दिन गुजर गये।
हुंकार रैलियों में ही दिखती रही फकत।
अबतक जवान कितने ही बे मौत मर गये।
वादों के शोर गुल में दर्द दब गया कहीं।
सारे किसान अपने ही खेतों से डर गये।
मुश्किल सवाल एक खङा और हो गया।
कितने यतीम घर को बता लौट कर गये।
गर्दो गुबार जुल्म सितम सब है अब तलक।
मंजर यही दिखा हमें जब भी जिधर गये
राजीव कुमार

कब दीवानापन देखा है

तरही गजल
कब दीवानापन देखा है
तुमने सिर्फ सुखन देखा है
दिल में रहने वालों ने कब
आंखो में सावन देखा है
बेबस बेकल चंचल कोमल।
हमने सबका मन देखा है
दुनिया को समझाने वालों।
क्या तुमने दरपन देखा है
रस्ते में मिलता है अक्सर ।
हमने वो रहजन देखा है।
दिलवालों को इस दुनिया ने।
जाने क्यूं दुश्मन देखा हे।

हमने तुमको खो कर  जांना।
बस आवारापन देखा है
राजीव कुमार
दो बोनस शेर
सबके खाते में आयेगा ।
किसने काला धन देखा हे।
आधे से ज्यादा हैं खाली ।
क्या तुमने जनधन देखा हे

Saturday, February 7, 2015

बङ गई मुश्किलें तब गगन के लिये ।

गजल आप की मोहब्बतों के हवाले
बङ गई मुश्किलें तब गगन के लिये ।
जब कबूतर उङाये अमन के लिये ।
शाम सूरज उम्मिदों का जब डल गया।
इक दिया जल उठा फिर किरन के लिये ।
शक्लों सूरत है दिलकश अदा है मगर।
क्या कहुं मैं तेरे काले मन के लिये।
गर हूकूमत में आये तो लायेंगे हम ।
झुठ बोला गया काले धन के लिये
पहली तनख्वा से इस देश में आज भी।
भाई लाता है तौहफे बहन के लिये ।
पूरे दिन धूप में हंस के जलता रहा।
फूल वो जो खिला था चमन के लिये।
रफ्ता रफ्ता गजल हो रही है जवां
कीजिये सब्र थोङा सुखन के लिये ।
राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...