Saturday, December 14, 2024

कहां चलता है कोई आस्था पर

नयी ग़ज़ल 

कहां चलता है कोई आस्था पर 
सभी कायम हैं अपनी धूर्तता पर 

मैं अपना घर भी इक दिन खोदता पर
हसीं आती है ऐसी मूर्खता पर

ज़मीं में दफ्न है जो इक सदी से
किसे विश्वास है उस देवता पर

अदालत है या है तलवार कोई 
जो लटकी है हमारी एकता पर

हमारा घर उजाड़ा जा रहा है 
कोई ये क्युं नहीं है सोचता पर

नई नस्लें जो उड़ना चाहती हैं
इन्हीं का क्युं कोई है काटता पर

गली कूचे लहू से सन गये हैं 
मगर है जश्न यारों रेख़्ता पर 

राजीव कुमार
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दू पसली के देह बा लेकिन सभनी के हड़काये ला

नई भोजपुरी हास्य ग़ज़ल ❤️

दू पसली के देह बा लेकिन सभनी के हड़काये ला  
ए दुनिया के केतना पागल शायर लोग बनाये ला

मंच प चढ़ के बेमतलब के नारा खूब लगाये ला
गदहा नीयर रेंक-रेंक के शेर प गीत सुनाये ला

देख कवित्री जी के शायर श्रोता गण बउराये ला 
मीटर बहर लहर से बेसी मेकअप आग लगाये ला

फेल बा जे इतिहास में उहे मंदिर अकबर बाबर पर 
वीर रस के नाम प खाली लबराई बतियाये ला

फूहड़-फूहड़ जोक सुना के खुश बा हास्य कवि बाकिर
ए लोगन के सुन के श्रोता आंसू बहुत बहाये ला

प्रेम के शायर चांद सितार जुल्फ हुस्न के फेरा में 
अपने घरे मेहरारू से बड़का मार पिटाये ला

शहर में केहू पुछते नइखे तब्बो शायर अपना के 
मंच प चढ़ के जौन एलिया के मउसा बतलाये ला

राजीव कुमार

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सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...