भोजपुरी ग़ज़ल (बिरहा)
धान के रोपनी आम के मौसम घर के याद सताये ला।
बिछड़ के सबसे रातो दिन अब मनवा बिरहा गाये ला।
गांव से बाहर निकले खातिर सपना देखले रहनी हम।
अब जब शहर में आ गईनी त गांव के सपना आये ला।
माई के अंचरा के छाया में धूप में भी ठंडा लागे।
आज मगर ए सी दफ्तर में बइठ के जी घबराये ला।
साईकिल छोड़ के कार चलावे लगनी लेकिन आजो ले।
हमरे दिल में एगो लइका कैंची रोज चलाये ला।
दोस्त संघतिया सब चल गईलें अपने अपने जीवन में।
लेकिन अब्बो खेले खातिर फिल्ड में मनवा जाये ला।
वक्त गुजर जायेला लेकिन स्वाद कबो नाहीं जाला।
भूजा सत्तू लिट्टी चोखा खाये के मन ललचाये ला।
दिन भर मस्ती सांझ के खेला रात के छत पे सुत्ते के।
लेकिन अब ई हाल बा राजू नींद के गोली खायेला।
राजीव कुमार
कैंची- बच्चे जब पहली बार अपने से बड़ी साईकिल चलाना सीखते है।
भोजपुरी ग़ज़ल की महफ़िल
पूरा सुनने के लिए लिंक चटकायें
https://youtu.be/Xgw-izHLbzM
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