Tuesday, December 29, 2020

दाल गेंहू आ धान ना होई

 भोजपुरी ग़ज़ल 


दाल गेंहू आ धान  ना होई 

एक दिन जब किसान ना होई


भूख देखिह सताई रतिया के 

और ओह पर बिहान ना होई


हमरे डर के तू तबले ना बुझ ब

जबले लइकी सयान ना होई


राजनीती से जेतना हम बानी 

केहू अतना हरान ना होई


माई खातिर मरे से घबराये 

कौनो अइसन जवान ना होई


जे खियावता देश के ओकर 

कबले पक्का मकान ना होई?


कर्ज माथे चढ़ल बा पहिले से

तहसे एकर निदान ना होई


जान जाई त जाई हमनी के 

एसे ज्यादा जियान ना होई 


खेत में होई ख़ुदकुशी जबले 

तबले भारत महान ना होई


राजीव कुमार

मरज चाहत का जब संगीन होगा

 मजहिया ग़ज़ल


मरज चाहत का जब संगीन होगा 

तेरा आशिक भी क्वारेन्टीन होगा


करोना जब भी होगा शाइरों को।

तुम्हारा हुस्न मेडिसीन  होगा


पकड़  खैनी तू इसको ठोक लेना

कि जब भी दिल तेरा गमगीन होगा


ग़ज़ल की लत हो जिसको यार उस पर

हमेशा बे-असर कोकीन होगा


मेरी आंखों से ज्यादा इस जमीं पर

समन्दर भी नहीं नमकीन होगा 


कबूतर आज नेता बन रहा है

इलेक्शन बाद ये शाहीन होगा


जो कुछ भी ठीक समझो कह दो अबसे

वही इस मुल्क़  का आईन होगा


राजीव

शाहीन - बाज

जिनका मकसद हमें मिटाना है।

 ग़ज़ल 


रहनुमाओं   को   अब जगाना है।

इस  लिये   इन्कलाब    लाना है।


जिनका  मकसद हमें मिटाना है।

सामने   उनके   सर   उठाना  है।


उनकी ताकत  को आजमाना है।

जुल्म सह कर  भी  मुस्कुराना है।


देखना    है    कि    बेकुसूरों  पर।

कब तलक उसको ज़ुल्म ढाना है।


तख्त और ताज छिन भी सकतें हैं

ये   शहंशाह     को    बताना   है


जो कफन सर से बांध कर निकले।

उनको   क्या  मौत   से  डराना है।


मांगने   से कभी    नहीं  मिलता। 

हक   हमें   छीन कर  ही पाना है।


उसको   लगता है  उनसे जीतेगा।

जिनको पत्थर पे गुल खिलाना है।


इस जमाने  से   ये   किसान नहीं।

इन   किसानों   से  ये   जमाना है।


राजीव कुमार

बात दिल में रोकात नईखे अब।

 भोजपुरी ग़ज़ल 


बात  दिल  में   रोकात नईखे अब।

मुह  से  लेकिन बोलात नईखे अब।


झुठ    धोखा     फरेब     बरियाई।

हमसे   कौनो   सहात   नईखे अब।


रोज  वाट्स  अप पे  मीम भेजेला।

चाहे   लईका  कमात  नईखे  अब।


बात   पर   बात     रोज   होखेला।

बात फिर    भी ओरात नईखे अब।


तीनों   टाईम    ए    देश   में  काहे।

केहू  बढ़ीयां   से  खात नईखे अब।


भूख     बेकारी      सम्प्रदायिकता।

कुछ भी  इहंवा से जात नईखे अब।


रेप    हत्या       डकैती      पेपर में।

आखिर   काहे  लिखात नईखे अब।


अउर   सम्मान    मत  दs हमरा के।

हमरे   दिल   में   समात नईखे अब।


सांच  बो लs  तsरs  त बोलs पर।

सांच  कहिंयो   सुनात   नईखे अब।

 

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...