ग़ज़ल
जो सच है गर उसे सच हमको बतलाना नहीं आता।
तो हमको झूठ से सचमुच में टकराना नहीं आता।
कहानी का वो हिस्सा भी नहीं लगता कहानी है।
कि जिस हिस्से में यारों कोई अफ़साना नहीं आता।
सफ़र इस ज़िन्दग़ी का मुश्किलों से है भरा इसमें।
वही पाता है मंज़िल जिसको घबराना नहीं आता।
दरो दीवार कुर्सी मेज़ बिस्तर और तन्हाई।
किसी को तुमसे अच्छा मुझको समझाना नहीं आता।
घुटन वहशत परेशानी ये सब तब तक ही रहते हैं।
कि जब तक सामने आंखों के मयख़ाना नहीं आता।
बताओ कैसे करते हम मुहब्बत इस ज़माने में।
हमें सर मार के पत्थर पे मर जाना नहीं आता।
मियां ये शाइरी उसके लिये बिल्कुल नहीं जिसको।
ख़ुद अपने दर्द के ऊपर ही मुस्काना नहीं आता।
राजीव कुमार
जो सच है गर उसे सच हमको बतलाना नहीं आता।
तो हमको झूठ से सचमुच में टकराना नहीं आता।
कहानी का वो हिस्सा भी नहीं लगता कहानी है।
कि जिस हिस्से में यारों कोई अफ़साना नहीं आता।
सफ़र इस ज़िन्दग़ी का मुश्किलों से है भरा इसमें।
वही पाता है मंज़िल जिसको घबराना नहीं आता।
दरो दीवार कुर्सी मेज़ बिस्तर और तन्हाई।
किसी को तुमसे अच्छा मुझको समझाना नहीं आता।
घुटन वहशत परेशानी ये सब तब तक ही रहते हैं।
कि जब तक सामने आंखों के मयख़ाना नहीं आता।
बताओ कैसे करते हम मुहब्बत इस ज़माने में।
हमें सर मार के पत्थर पे मर जाना नहीं आता।
मियां ये शाइरी उसके लिये बिल्कुल नहीं जिसको।
ख़ुद अपने दर्द के ऊपर ही मुस्काना नहीं आता।
राजीव कुमार