Sunday, December 23, 2018

ज़ोर ज़ुल्मत बेनियाज़ी हर बला आबाद है।

ज़ोर ज़ुल्मत बेनियाज़ी हर बला आबाद है।
यूं समझिये शह्र का रहबर ही अब सय्याद है।

हर बुलंदी बक्श देता है ख़ुदा उस शख़्स को।
जो अना की क़ैद से पूरी तरह आज़ाद है।

इक मुसलसल इम्तिहां है ज़िन्दगी का सिलसिला।
फ़लसफ़ा-ए-ज़िन्दगी तो ज़िन्दगी के बाद है।

इसलिये हमने भुला दी है जहां से दुश्मनी।
आप भी सब भूल जाओगे अभी जो याद है।

गर्दिश ए उल्फ़त है मेरा लुत्फ़ ए रगबत दोस्तों।
कौन कहता है कि राजू इश्क़ में बर्बाद है

राजीव कुमार

जो मिल सकी न वही इक ख़ुशी है और मैं हूँ।

जो मिल सकी न वही इक ख़ुशी है और मैं हूँ।
तेरा ख़याल है इक तिश्नगी है और मैं हूँ

बिछड़ते वक़्त मिले थे जहाँ वहीं अबतक
रुकी रुकी सी अभी ज़िन्दगी है और मैं हूँ

न जाने कौन सी शय की तलाश है मुझको
बस इक हयात है आवारगी है और मैं हूँ

मै जब भी देखता हूं आईना तो लगता है
मेरे ही सामने इक अजनबी है और मैं हूँ

जहाँ से आ रही हैं सिसकियों की आवाजें।
उसी मुक़ाम पर अब शाइरी है और मैं हूं

राजीव कुमार

स्याह शब को हसीं दर पे रख के आया हूँ

स्याह शब  को हसीं दर पे रख के आया हूँ
सहर को ओस की चादर पे रख के आया हूँ।

वो इक परिंदा जो भटका हुआ था सुब्ह से
मै आज शाम उसे घर पे रख के आया हूँ

ग़ज़ल के शेर ये नज्में ये दिल की वीरानी।
जो बुझ गया उसी मंज़र पे रख के आया हूँ

हर एक याद हर ख़याल इक हसीं दुनिया ।
तुम्हारे ख़्वाब के बिस्तर पे रख के आया हूँ

मुझे यकीन महब्बत पे था तभी शायद ।
मैं दिल को आप के खंजर पे रख के आया हूँ

क़िताब मेज घड़ी और घर की दीवारें।
मैं अपना सारा जहां घर पे रख के आया हूँ

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...