Saturday, August 1, 2020

जब तक हयात का ये सफ़र बरक़रार है

ग़ज़ल 

जब तक हयात का ये सफ़र बरक़रार है  
हर कोई इस जहान में इक शहसवार है

मौत आ गयी है दर पे मगर जाने क्युँ हमें।
अब भी उस एक शख़्स का ही इन्तज़ार है

कागज़ के चीथड़ों में दबा कह रहा है सच।
अख़बार और कुछ भी  नहीं इश्तिहार है

डरपोक आदमी हूँ ये सच किस तरह कहूँ
मुज़रिम तो मौज में हैं दरोगा फ़रार है

मौसम तो आम का है मगर हर जबान पर।
हैरान हूं कि अब भी करेला सवार है

दिल भी अजीब शय है इसे जितना ख़ुश रखो।
उतना ही ये लगे कि अभी सोगवार है

राजीव कुमार

शहसवार - घुड़सवार
सोगवार- दुखी

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...