ग़ज़ल
जब तक हयात का ये सफ़र बरक़रार है
हर कोई इस जहान में इक शहसवार है
मौत आ गयी है दर पे मगर जाने क्युँ हमें।
अब भी उस एक शख़्स का ही इन्तज़ार है
कागज़ के चीथड़ों में दबा कह रहा है सच।
अख़बार और कुछ भी नहीं इश्तिहार है
डरपोक आदमी हूँ ये सच किस तरह कहूँ
मुज़रिम तो मौज में हैं दरोगा फ़रार है
मौसम तो आम का है मगर हर जबान पर।
हैरान हूं कि अब भी करेला सवार है
दिल भी अजीब शय है इसे जितना ख़ुश रखो।
उतना ही ये लगे कि अभी सोगवार है
राजीव कुमार
शहसवार - घुड़सवार
सोगवार- दुखी