ग़ज़ल
तन्हाई का बोझ उठा लूं ग़म को गले लगा लूं मैं।
सोच रहा हूं अपने घर में इक घर और बसा लूं मैं।
जंगल काटे शह्र बसाये शह्र बसा कर याद आया।
गमले में इक पेड़ लगा कर छत पर उसे सजा लूं मैं।
कैसे घर का खर्च चलेगा सोच रहा था इतने में।
हुक़्म हुआ कि जैसे भी हो अपना काम चला लूं मैं।
इश्क़ उसी से दिल में वो ही और इबादत उसकी ही।
जी करता है मन-मंदिर में उसका बुत बनवालूं मैं।
ग़म का मौसम ह़िज्र का आलम रंज ख़मोशी वीरानी।
इन कांटों को फूल बना लूं या ग़ज़लों में ढालूं मैं।
दोस्त पड़ोसी दफ़्तर दुनिया अपनी हर आज़ादी पर।
अब हाकिम ये बोल रहा है इक पहरा बैठा लूं मैं।
शह्र के हर कोने में उगती वहशत देख के लगता है।
इस जंगल में इक चिंगारी अबकी बार उछालूं मैं।
राजीव कुमार
तन्हाई का बोझ उठा लूं ग़म को गले लगा लूं मैं।
सोच रहा हूं अपने घर में इक घर और बसा लूं मैं।
जंगल काटे शह्र बसाये शह्र बसा कर याद आया।
गमले में इक पेड़ लगा कर छत पर उसे सजा लूं मैं।
कैसे घर का खर्च चलेगा सोच रहा था इतने में।
हुक़्म हुआ कि जैसे भी हो अपना काम चला लूं मैं।
इश्क़ उसी से दिल में वो ही और इबादत उसकी ही।
जी करता है मन-मंदिर में उसका बुत बनवालूं मैं।
ग़म का मौसम ह़िज्र का आलम रंज ख़मोशी वीरानी।
इन कांटों को फूल बना लूं या ग़ज़लों में ढालूं मैं।
दोस्त पड़ोसी दफ़्तर दुनिया अपनी हर आज़ादी पर।
अब हाकिम ये बोल रहा है इक पहरा बैठा लूं मैं।
शह्र के हर कोने में उगती वहशत देख के लगता है।
इस जंगल में इक चिंगारी अबकी बार उछालूं मैं।
राजीव कुमार