Wednesday, June 10, 2020

ग़ज़ल को नूर दिया काम शाइरों को दिया।

ग़ज़ल

ग़ज़ल को नूर  दिया   काम शाइरों को दिया।
उसे तलाश करो जिसने आँसुओं को दिया।

ये  घाव  दिल  पे मुहब्बत की नेमतें समझो।
दर अस्ल ज़ख़्म वही है जो दूसरों को दिया।

बहुत  हसीन   बहुत  लाजवाब   होगी   तुम।
उसे  पता था  तभी  उसने आईनों को दिया।

दरख़्त   फूल   परिंदे    फ़ज़ाओं  की रंगत।
मुसव्विरों    ने   यही रूप  पर्वतों को दिया।

क्यूँ उसको कोई नहीँ देख सुन समझ सकता।
वो जिसने सबके लिये अपनी रहमतों को दिया।

उसी    रक़ीब  से  उम्मीद  अब  सभी  को  है।
हर एक  ज़ख़्म  यहाँ जिसने  बेबसों को दिया।

तड़पते  भूख   से   बच्चों   का  पेट  भरती है।
ज़कात  वो  नहीं  जो हमने बुतक़दों को दिया।

इसी   ज़मीन  की  मिट्टी  में   दफ़्न  है  वो  भी।
ज़मीं को बाँट के जिस शह ने सरहदों को दिया।

राजीव कुमार

मुसव्विर- चित्रकार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

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